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पॉकेटमार एम्प्लॉयर

कर्मचारियों के टुकड़ों पर फलने-फूलने वाला एम्प्लॉयर


दादी-नानी अकसर बताती थी कि बचपन में मैं जब भी किसी के साथ खाने बैठता तो खाते समय अपने एक हाथ से सामने वाले का हाथ पकड़ लेता और दूसरे हाथ से जल्दी जल्दी खाने लगता। दरअसल चिंता यह नहीं थी कि सामने वाला ज़्यादा खा लेगा, बल्कि आशंका इस बात की थी कि कहीं मैं भूखा न रह जाऊँ। यह बचपने से अधिक कुछ न था, इसलिए घरवाले डाँटने की बजाय खूब हँसते थे। वे जानते थे कि वे इसकी भरपाई कर सकते हैं। रसोई में भोजन की कमी जो नहीं थी।

थोड़ा बड़ा हुआ तो पता चला कि कुछ जानवर जैसे गीदड़, कुत्ते इत्यादि जानवर अकसर दूसरों के शिकार पर हाथ मारने की ताक में रहते। उनको देखकर मैं रोमांचित तो होता किन्तु गुस्सा नहीं।  क्योंकि यह उनके लिए पेट की लड़ाई थी। सम्भवतः उनकी योग्यता उतनी ही थी।

थोड़ा और बड़ा हुआ तो पता चला कि औरों में भी यह प्रवृत्ति पाई जाती है। इन्हीं में से एक है एक्सेल बुक्स (Excel Books, Dariyaganj, Delhi, now in jhandewala). इस कंपनी पर मुझे हँसी नहीं आई, न ही रोमांच हुआ, किन्तु हाँ, असंतोष जरूर हुआ जो धीरे धीरे आक्रोश में तब्दील होता चला गया। कारण यह था कि इनका उद्देश्य अपनी आधारभूत जरूरतों की पूर्ति करना नहीं, अपितु अय्याशी का सामान जुटाना था।

जनवरी 2017 में मैंने Excel Books जॉइन किया था। जोइनिंग से पहले कोई भी कंपनी अपने नियम व शर्तें नहीं बताती। जोइनिंग के बाद ही पता चलता है कि जाल के भीतर जो गड्ढा खोदा गया है वह कितना गहरा और घातक है।

जॉइनिंग के बाद पता चला कि एक हज़ार रुपये हर माह कंपनी के खाते में छोड़ने पड़ेंगे। महीने में मात्र एक ही छुट्टी थी। इसे आप CL अथवा PL कुछ भी समझ सकते हैं। इसके अतिरिक्त 7 से 8 त्योहारों की छुट्टियाँ मिलती थीं। यह संख्या राजन चोपड़ा के मूड पर निर्भर करती थी। हालाँकि यह बात और है कि उनका मूड अकसर गड़बड़ ही रहता था। ऑफिस में एक वाशरूम/टॉयलेट था जिसमें जाने के लिए कंपनी मालिक राजन चोपड़ा के केबिन से होकर गुजरना पड़ता था। दूसरा विकल्प था कंपनी के बाहर की सरकारी असुविधा, जहाँ आँख और नाक दोनों को ही बंद करके जाना पड़ता था।

समय बीता तो पता चला कि कई वर्षों से कर्मचारियों का वेतन नहीं बढ़ा है और आगे भी बढ़ने की संभावना नहीं है। जब जब यह बात चोपड़ा के सामने उठाई गई, वह वातावरण को इतना आतंकित कर देता कि भविष्य में कोई भी कर्मचारी इसकी कल्पना तक से तौबा कर लेता।

एक तरफ़ समय तेज़ी से बीतता जा रहा था तो दूसरी ओर हमारे वेतन से कटने वाले 1000 भी एक-एक करके बड़ी राशि में तब्दील होते जा रहे थे। फिर बीच-बीच में छटनी कार्यक्रम भी शुरू हो गया था। पहले रेनू मैडम का नम्बर लगा। एक दिन का भी नोटिस नहीं दिया गया। सिक्योरिटी मनी तो नहीं ही मिली, सैलरी भी सम्भवतः नहीं दी। इसके बाद अविनाश, रोहित, भरत जी, पांडेय जी आदि को भी उनका मेहनताना नहीं दिया गया। हमारी चिंताएँ बढ़ती जा रही थी क्योंकि हमारी सिक्योरिटी मनी 20 हज़ार का आंकड़ा पार कर चुकी थी।

एक दिन जो ऑफिस बॉय था, उसके साथ तो इन्होंने हद ही कर दी। उसने परेशान होकर जब नौकरी छोड़ने की बात की तो ये उसे धमकाने लगे कि अगर नौकरी छोड़ी तो चोरी का इल्ज़ाम लगा देंगे। उसके पिता भी ऑफिस में निवेदन करने आए, किन्तु इन्होंने एक न सुनी। अंततः जैसे-तैसे वह जाने में सफल रहा और उसकी जगह एक नया ऑफिस बॉय आ गया, नाम था आफ़ताब। आफ़ताब भी धीरे-धीरे परेशान होने लगा। उसने भी नौकरी छोड़ने की बात कही तो इन्होंने पहले उसे भी डराया-धमकाया, किन्तु जब इससे बात नहीं बनी तो उसके पैसे काट लिए। काटी हुई राशि बड़ी थी और आफ़ताब के पास कोई और चारा भी नहीं था तो वह इनका एक कंप्यूटर मोनिटर उठाकर घर ले गया। उसने इन लोगों से कहा कि जब तक उसके पैसे नहीं मिलेंगे, वह मोनिटर नहीं देगा।

इसके बाद एक दिन मैनेजर ने उसे धोखे से बुलाकर केबिन में बंद कर उससे हाथापाई शुरू कर दी। करीब चार मुस्टंडों ने उसे घेरा हुआ था। शर्म की बात ये है कि उससे हाथापाई करने वाले भी कर्मचारी ही थे। किंतु सम्भवतः वे खुद को मालिक समझ बैठे थे। ऐसे हरामखोरों की वजह से ही कंपनी मालिकों की हिम्मत इतनी बढ़ जाती है। ऐसे कर्मचारी लगभग हर कंपनी में होते हैं जो अपनी वफादारी सिद्ध करने के लिए कपंनी के इशारों पर कुत्तों की तरह तलवे तक चाटने को तत्पर रहते हैं। कुछ कर्मचारी ऐसे भी इस कंपनी में थे/थी, जो जब कंपनी किसी को बिना किसी नोटिस के निकाल देती थी, तब अपने में मस्त रहते थे। उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता था। किंतु जब कोई कर्मचारी बिना नोटिस दिए जाता, तो उसकी चुगली और बुराइयाँ शुरू कर देते। इन्हें आप छोटे मालिक भी कह सकते हैं। आप भी एक बार शांति से सोचिए कि आपकी कंपनी में कितने छोटे मालिक हैं।

खैर किसी तरह आफ़ताब इनके चंगुल से निकल भागने में सफल हो गया और भागकर सीधे पुलिस थाने चला गया।

इधर ये भी अपनी धूर्त बुद्धि से उसपर विभिन्न आरोपों की सूची बना थाने पहुंच गए। आफ़ताब ने समझदारी ये की थी कि जब वह मोनिटर लेकर भागा तो सीधे थाने गया और शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने ही उसे ऑफिस में अपना हिसाब माँगने भेजा था। इसलिए इनकी वहाँ एक न चली। पुलिस ने इन्हें धमकाकर छोड़ दिया और आफ़ताब का पूरा पैसा तुरन्त देने को कहा।

आफ़ताब था तो 13-14 साल का, किन्तु इस पूरे घटनाक्रम में वह इनका बाप निकला।

यह मामला निपट तो गया किन्तु सभी कर्मचारियों को इस बात का आभास हो गया था कि उन्हें भी अपना मेहनताना हासिल करने के लिए जमीन-आसमान एक करना होगा।

कंपनी ने जिसे मैनेजर के पद पर नियुक्त किया था यानी मोशिता, उसे पब्लिशिंग की बिलकुल भी जानकारी नहीं थी। इसका पता हमें पहली बार तब चला जब हिंदी के 100 पेज की टाइपिंग की बात हुई और मोशिता ने कहा कि 100 पेज दो घण्टे में टाइप हो जाएंगे न? धीरे-धीरे उनकी यह योग्यता पूर्णतः उभरकर आने लगी।

समस्या यह नहीं होती कि आपको कोई चीज नहीं पता है, समस्या यह होती है कि पता न होने के बावजूद आप उसे सीखने अथवा जानने की बजाय सही को भी गलत सिद्ध करने में जुट जाएँ। संयोग देखिए कि इन्हीं दिनों मैंने भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का नाटक अंधेर नगरी चौपट राजा पढ़ा और ऑफिस की स्थिति देखकर यह नाटक इतना प्रासंगिक लगा कि उसे मैंने अपनी डायरी में लिख लिया।

एक दिन इसी अंधेर नगरी के छोटे चौपट…., ओह सॉरी, मेरा मतलब मोशिता ने हिंदी साहित्य का इतिहास नामक पुस्तक दो दिन में तैयार करने को कहा और साथ ही यह भी कहा कि एक-एक शब्द आपका अपना होना चाहिए, कहीं से कॉपी न हो। मुझे आभास हो गया था कि इस अंधेर नगरी में रहने का मूल्य चुकाने का समय आ गया है। मैंने उन्हें स्पष्ट कह दिया कि दो दिन में यह बिलकुल भी सम्भव नहीं है। मोशिता को न सुनने की आदत नहीं थी। तो उन्होंने मुझे और मेरे सहयोगी आलोक जी को कहा कि यदि कल तक पुस्तक तैयार न हो पाए तो रिजाइन कर दीजिए।

हम दोनों ने ही एक माह के नोटिस के साथ रिजाइन कर दिया। जब हमने हिसाब-किताब के बारे में पूछा तो बताया गया कि एक माह के बाद मिलेगा। हमने एक माह इंतज़ार किया। एक माह बाद जब वहाँ से कोई सूचना नहीं मिली तो मैंने उन्हें याद दिलाया और हमारा चेक हमें देने का निवेदन किया। निवेदन के बाद एक्सेल बुक से कनिका का कॉल आया और हमें बताया गया कि उनके यहाँ नियम 45 दिन का है। अतः चेक 45 दिन बाद मिलेगा। मेरा खून खौल गया। मैं इंतज़ार के पक्ष में नहीं था किंतु आलोक जी के कहने पर हमने तय किया कि जहाँ एक माह इंतज़ार किया वहाँ 15 दिन और सही। हालाँकि यह नियम कब बदला, हमें पता ही नहीं चला।

15 दिन भी बीत गए किन्तु उनकी तरफ से चेक के संदर्भ में कोई सूचना नहीं मिली। मैंने जब उन्हें दोबारा सम्पर्क किया तो बताया गया कि राजन चोपड़ा अपने महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के एडमिशन में व्यस्त हैं अतः उनके आने पर ही यह सम्भव हो पाएगा। पूछने पर हमें कोई समय-सीमा नहीं बताई गई कि वे कब तक फ्री होंगे। दो माह से ऊपर हो गया। मैंने इस दौरान उन्हें कई ईमेल किए, जिसमें राजन चोपड़ा को भी शामिल किया था किंतु कोई जवाब नहीं आया। मेरे सब्र का बांध अब टूट चुका था।

मैंने अब उन्हें अंतिम ईमेल भेजा कि यदि मेरा चेक एक सप्ताह के भीतर नहीं मिला तो मुझे कानूनी और सामाजिक कार्रवाई के लिए विवश होना पड़ेगा। बस फिर क्या था, व्यस्त राजन चोपड़ा ने सुबह-सुबह मुझे फोन किया और बड़ी ही मासूमियत से इस संदर्भ में पूछा। फिर उन्होंने मुझे भरोसा दिलाया कि मेरा चेक शीघ्र ही मुझे मिल जाएगा। एक दिन बाद ही चेक मेरे हाथ में था।

ये वही मासूम चोपड़ा था जिसे मैंने कई कर्मचारियों का मेहनताना देने से मना करते हुए सुना था। खैर, मुझे इस बात की संतुष्टि थी कि मैं अपना अधिकार ले सकने में सफल रहा। यानी इस अंधेर नगरी से सुरक्षित निकलने में कामयाब हुआ।



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