कर्मचारियों के टुकड़ों पर फलने-फूलने वाला एम्प्लॉयर दादी-नानी अकसर बताती थी कि बचपन में मैं जब भी किसी के साथ खाने बैठता तो खाते समय अपने एक हाथ से सामने वाले का हाथ पकड़ लेता और दूसरे हाथ से जल्दी जल्दी खाने लगता। दरअसल चिंता यह नहीं थी कि सामने वाला ज़्यादा खा लेगा, बल्कि आशंका इस बात की थी कि कहीं मैं भूखा न रह जाऊँ। यह बचपने से अधिक कुछ न था, इसलिए घरवाले डाँटने की बजाय खूब हँसते थे। वे जानते थे कि वे इसकी भरपाई कर सकते हैं। रसोई में भोजन की कमी जो नहीं थी। थोड़ा बड़ा हुआ तो पता चला कि कुछ जानवर जैसे गीदड़, कुत्ते इत्यादि जानवर अकसर दूसरों के शिकार पर हाथ मारने की ताक में रहते। उनको देखकर मैं रोमांचित तो होता किन्तु गुस्सा नहीं। क्योंकि यह उनके लिए पेट की लड़ाई थी। सम्भवतः उनकी योग्यता उतनी ही थी। थोड़ा और बड़ा हुआ तो पता चला कि औरों में भी यह प्रवृत्ति पाई जाती है। इन्हीं में से एक है एक्सेल बुक्स (Excel Books, Dariyaganj, Delhi, now in jhandewala). इस कंपनी पर मुझे हँसी नहीं आई, न ही रोमांच हुआ, किन्तु हाँ, असंतोष जरूर हुआ जो धीरे धीरे आक्रोश में तब्दील होता चला गया। कारण यह ...
हर क्षेत्र में सुधार हो रहे है किंतु कर्मचारी की स्थिति आज भी बदतर है। इसका एक कारण कंपनी की मनमानी है और दूसरा कारण कर्मचारी की चुप्पी। यदि अब भी चुप रहे तो आपकी स्थिति स्त्री से भी बदतर हो सकती है। अतः शीघ्र ही कलम उठाइए और आज ही आपबीती लिखकर भेजिए। प्रकाशित हम करेंगे। 9971275250 / karmcharishaktipeeth.blogspot.com